1 / 10
2 / 10
3 / 10
4 / 10
5 / 10
6 / 10
7 / 10
8 / 10
9 / 10
10 / 10

a b c d e f g h i j k l m n o p q r s t u v w x y z a b c d e f g h i j k l m n o p q r s t u v w x y z hindi magazine guldusta online lekh new zealand recipies nuske tips abcdefghijklmnopqrstuvwxyz qwertyuiop content हिंदी आरम्भ अशुभ तो अंत अशुभ एक चुहा एक वन में किसी जलाश्य के निकट एक बिल में रहता था। उस जलाश्य का वासी एक मेढ़क प्राय: धूप सेकने के लिए जल से बाहर आ जाता था। अत: चुहा और मेढ़क दोनों पक्के दोस्त बन गए। परंतु चुहे और मेढ़क की मित्रता वांछनिय नहीं थी। क्योंकि मेढ़क जलचर था परंतु चुहा स्थलचर। अत: उनकी मित्रता किसी दु:खांत घटना की सूचक थी। एक दिन मेढ़क ने चूहे से कहा, “आओ हम एक रस्सी द्वारा एक दूसरे से बंध जाएं और इस प्रकार हम एक दूसरे से कभी अलग नहीं होंगे”। अत: दोनों मित्रों ने अपनी टांगे एक दूसरे से बांध लीं। यधपि धरती पर तो कोई घटना नहीं हुई तथापि जलाश्य में चूहे के लिए संकट उपस्थित हो गया। मेढ़क जलाश्य में घसीटते हुए खुशी से तैरने लगा। फलत: चूहा शीघ्र ही ड़ूबकर मर गया तथा उसका मृत शरीर पानी पर तैरने लगा। आकाश में एक उड़ती हुई चील ने मृत चूहे को देखा तो झपट कर उसे उठा ले गई। जब चील चूहे को लेकर उड़ी तो मेढ़क भी उसके साथ ही लटक कर चला गया और चील का शिकार बन गया। * * * * * समाधान एक बूढा व्यक्ति था। उसकी दो बेटियां थीं। उनमें से एक का विवाह एक कुम्हार से हुआ और दूसरी का एक किसान के साथ। एक बार पिता अपनी दोनों पुत्रियों से मिलने गया। पहली बेटी से हालचाल पूछा तो उसने कहा कि इस बार हमने बहुत परिश्रम किया है और बहुत सामान बनाया है। बस यदि वर्षा न आए तो हमारा कारोबार खूब चलेगा। बेटी ने पिता से आग्रह किया कि वो भी प्रार्थना करे कि बारिश न हो। फिर पिता दूसरी बेटी से मिला जिसका पति किसान था। उससे हालचाल पूछा तो उसने कहा कि इस बार बहुत परिश्रम किया है और बहुत फसल उगाई है परन्तु वर्षा नहीं हुई है। यदि अच्छी बरसात हो जाए तो खूब फसल होगी। उसने पिता से आग्रह किया कि वो प्रार्थना करे कि खूब बारिश हो। एक बेटी का आग्रह था कि पिता वर्षा न होने की प्रार्थना करे और दूसरी का इसके विपरीत कि बरसात न हो। पिता बडी उलझन में पड गया। एक के लिए प्रार्थना करे तो दूसरी का नुक्सान। समाधान क्या हो ? पिता ने बहुत सोचा और पुनः अपनी पुत्रियों से मिला। उसने बडी बेटी को समझाया कि यदि इस बार वर्षा नहीं हुई तो तुम अपने लाभ का आधा हिस्सा अपनी छोटी बहन को देना। और छोटी बेटी को मिलकर समझाया कि यदि इस बार खूब वर्षा हुई तो तुम अपने लाभ का आधा हिस्सा अपनी बडी बहन को देना। प्रेषक--‘राजन सिंह’ शिक्षाप्रद कहानी, बुजुर्गो की जुबानी मूर्ख मित्र से बुद्धिमान शत्रु भला एक बार की बात है कि एक बारहसिंहा बीमार पड़ गया। अत: वह हरी-भरी घास से युक्त भूमि के एक टुकड़े पर जाकर लेट गया। एक दो दिन में वह इतना कमजोर हो गया कि उसमेंहिलने ड़ुलने की भी हिम्मत न रही। बारह सिंह की बिमारी का समाचार वन में फैल गया तथा उसके मित्र उससे मिलने आने लगे। वे सभी घास चरने वाले पशु थे। बारह सिंगा की देखभाल करने के लिए वे सब उसके पास ठहर गए तथा वहां की हरी घास चरते रहे। फलत: कुछ ही दिनों में वहां घास का एक तिनका न रहा। इधर कुछ दिनों के पश्चात बारहसिंगा भी स्वस्थ होने लगा। यह देखकर उसके मित्र एक-एक करके वापिस जाने लगे तथा एक दिन वह अकेला रह गया। परंतु कमजोरी के कारण वह अब भी चलने-फिरने से लाचार था। उस भूमि का सारा घास तो बारहसिंगे के मित्र ही चर गए थे तथा वह स्वयं चल-फिर नहीं सकता था। फलत: वह भूख के कारण ही मर गया। यदि उसके मित्र उसके इर्द-गिर्द का घास न चरते तो वह उसे खाकर जीवित रह सकता था। परंतु उसके मूर्ख मित्र तो शत्रुओं से भी बढ़कर सिद्ध हुए। खुशी, उदासी और प्यार एक समय की बात है एक टापु पर सभी अहसास जैसे: खुशी, उदासी, ज्ञान और प्यार रहते थे। एक दिन आकाशवाणी हुई कि ये टापु ड़ूबने वाला है इसलिए अपनी-अपनी नाव पर निकल जाओ और ये टापु छोड़ दो। प्यार जहां तक सम्भव हो अपने सुखद पल संजो कर रखना चाहता था। जब टापु बिल्कुल ड़ूबने को था तब प्यार ने मदद लेने का फैंसला किया। अमीरी अपनी बड़ी नाव में प्यार की बगल से गुजर रही थी। तब प्यार ने अमीरी से कहा—“अमीरी! क्या तुम मुझे भी अपने साथ ले जाओगी? अमीरी ने जवाब दिया—“नहीं! मैं तुम्हें अपने साथ नहीं ले जा सकती क्योंकि मेरी नाव में बहुत मात्रा में सोना-चांदी है और तुम्हारे लिए नाव में जगह नहीं है। तब प्यार ने वैनिटी से मदद के बारे में सोचा जो एक सुन्दर वैसल में जा रही थी। “वैनिटी कृपया मेरी मदद करो। वैनिटी ने कहा, “नहीं प्यार मैं तुम्हारी मदद नहीं कर सकती क्योंकि तुम पूरी तरह से भीग चुकी हो और मेरी नाव खराब हो जायेगी। उदासी प्यार के काफी नज़दीक थी इसलिए प्यार ने मदद के लिए पूछा, “उदासी मुझे भी अपने साथ ले चलो? उदासी ने कहा, “ओह प्यार! मैं खुद इतनी उदास हूं इसलिए मैं अकेले रहना चाहती हूं।“ खुशी भी प्यार के सामने से जा रही थी। खुशी स्वयं इतनी खुश थी कि उसने प्यार की आवाज़ ही नहीं सुनी। तभी एक आवाज़ आई। आओ, मैं तुम्हें अपने साथ ले चलुं। ये बड़प्पन था। प्यार इतना खुश था कि वह बड़प्पन का नाम पूछना भी भूल गया। जब नाव एक सूखे स्थान पर पहुंच गयी तब बड़प्पन चला गया। तब प्यार को अहसास हुआ कि किस तरह बड़प्पन ने उसकी मदद की है। तब उसने दूसरे बड़प्पन ‘ज्ञान से पूछा कि मेरी मदद किसने की है? ज्ञान ने बताया कि उसकी मदद समय ने की है। प्यार ने कहा, “समय ने मेरी मदद क्यों की है? ज्ञान बुद्धिमता से मुस्कराया और कहा, “क्योंकि समय ही ये बात समझ सकता है कि प्यार कितना महान है। ‘इन्दु’ * * * * Story of Happiness, Sadness, Knowledge, and Love Once upon a time, there was an island where all the feelings lived: Happiness, Sadness, Knowledge, and all of the others including Love. One day it was announced to the feelings that the island would sink, so all repaired their boats and left. Love wanted to persevere until the last possible moment. When the island was almost sinking, Love decided to ask for help. Richness was passing by Love in a grand boat. Love said, "Richness, can you take me with you?" Richness answered, "No, I can't. There is a lot of gold and silver in my boat. There is no place here for you. Love decided to ask Vanity who was also passing by in a beautiful vessel, "Vanity, please help me!" "I can't help you Love. You are all wet and might damage my boat." Vanity answered. Sadness was close by so Love asked for help, "Sadness, let me go with you." "Oh....Love, I am so sad that I need to be by myself!" Happiness passed by Love too, but he was so happy that she did not even hear when Love called her! Suddenly, there was a voice, "Come Love, I will take you." It was an elder. Love felt so blessed and overjoyed that he even forgot to ask the elder his name. When they arrived at dry land, the elder went his own way. Love realizing how much he owed the elder and asked Knowledge, another elder, "Who helped me?" "It was Time," Knowledge answered. "Time?" asked Love. "But why did Time help me?" Knowledge smiled with deep wisdom and answered, "Because, only Time is capable of understanding how great Love is." अन्धा प्रेम - Blind Love एक बार की बात है एक व्यक्ति वन के छोर पर एक झोपड़ी में रहता था। उसकी एक अत्यंत रूपवती पुत्री भी थी। वन का राजा सिंह प्राय: किशोरी को देखता था। वह उसे बहुत अच्छी लगती थी। होते-होते उसे युवती से प्रेम हो गया। अत: उसने लड़की के पिता से उसके साथ विवाह करने की इच्छा प्रगट की। पिता एक खुंखार सिंह से भला अपनी पुत्री के विवाह के लिए कैसे सहमत हो जाता? परंतु इन्कार करके सिंह से शत्रुता मोल लेने का साहस भी उसमें नहीं था। अत: खूब सोच-समझ कर उसने एक योजना बनाई। युवती के पिता ने सिंह से कहा, “मेरी पुत्री तुम्हारे बड़े-बड़े दांतों और तीखे नाखुनों से ड़रती है। यदि तुम अपने सारे दाँत निकलवा दो और नाखून उखड़वा दो तो वह तुमसे विवाह कर लेगी”। प्रेम में अन्धा सिंह इन दोनों शर्तों को मान गया। उसने इसके परिणाम पर कोई विचार नहीं किया। जब उसके दांत और नाखून उखड़ गये तो वह बिल्कुल निहत्था रह गया। अत: युवती के पिता ने उसे ड़ण्ड़ों से पीट-पीट कर भगा दिया। खतरों से खेलना सीखें एक बार एक छोटा बालक झार-बेरी के पौधों के पास खेलने गया। पौधे पके हुए और रसीले बेरों से लदे हुए थे। उन्हें देखकर लड़के के मुंह में पानी आ गया। बालक बेर बीनने लगा ताकि वह फुरसत में उन्हें खा सके। परंतु अचानक उसके हाथ में कांटा चुभ गया। पीड़ा होने से वह छटपटाया तथा उसके हाथों की त्वचा पर दाने निकल आए। अत: बेर बीनना छोड़कर लड़का घर को भाग गया तथा जाकर सारी बात अपनी माँ को बताई। आँखों में आँसू भरकर तथा वह सिसकते हुए बोला, “माँ! मैंने तो कांटे को केवल छुआ था परंतु उसने मुझे ड़ंक मार दिया”। माँ ने हँसते हुए अपने पुत्र को दिलासा दिया तथा कहा, “काँटे ने तुम्हे इस लिए ड़ंक मारा क्योंकि तुमने केवल उसे छुआ था। यदि तुम उसे मजबूती से पकड़ लेते तो वह तुम्हे कोई हानि नहीं पहुंचाता। खतरों का सामना किए बिना कुछ प्राप्त नहीं हो सकता। हर गुलाब के फूल की रक्षा के लिए कुछ कांटे होते हैं। अत: बेर खाने हों तो काँटों से जूझना सीखो”। जादु की छड़ी एक लड़का था वह बहुत गरीब था। वह बुद्धिमान और तेजस्वी था। गरीब होने के कारण वह पढ़ नहीं पा रहा था। उसका नाम चतुरानन्द था। एक बार की बात है, वह अपने दोस्तों के साथ गाय चराने गया। उसने गाय को एक ओर चरने के लिए छोड़ दिया और अपने दोस्तों के साथ कबड्ड़ी खेलने लगा। अब चतुरानन्द को प्यास लग गई, वह पानी पीने एक ओर चल दिया जिधर नदी थी। नदी कुछ ही दूरी पर थी। वह नदी किनारे गया तो उसने पानी पिया और ज्योंही नज़र घुमाई कि उसकी नज़र एक छड़ी पर पड़ी। उसने छड़ी को उठा लिया क्योंकि छड़ी बहुत ही सुन्दर थी। वैसे तो चतुरानन्द बहुत ही सीधा-साधा था। जब वह घर आया तो छड़ी अचानक बोली, “मैं जादु की छड़ी हूं, तुम मुझसे जो भी कहोगे वही होगा”। चतुरानन्द को बड़ा आश्चर्य हुआ। चतुरानन्द ने कहा, “ए जादु की छड़ी, तुम्हारा जन्म कब हुआ”? छड़ी बोली, “करीब 60 वर्ष पूर्व मुझे एक व्यापारी ने खरीदा था”। एक दिन की बात है उस व्यापारी ने मुझे एक झाड़ी में छुपा दिया और सोचा कि जब लौटुंगा तब इसे लेकर घर चला जाउंगा। उस समय यह देश गुलाम था। व्यापारी जंगल से लेकर गुजर रहा था। एक दुष्ट अंग्रेज ने उसे मार ड़ाला और मैं उस झाड़ी में दुबकी रही और आज तुम मुझे लाये हो। चतुरानन्द को यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ। एक दिन छड़ी और चतुरानन्द एक घने जंगल में प्रविष्ट हुए। छड़ी ने कहा—ये जंगल नहीं है ये मायाजाल है, तुम्हें यहाँ के राक्षस का नाश करना है। चतुरानन्द बोला—मगर वह राक्षस तो बहुत बलवान होगा और मैं साधारण लड़का उस राक्षस का नाश कैसे करुंगा? छडी बोली—तुम ड़रो मत, उस राक्षस को मारने का एक सरल तरीका है। उसके पास एक मणि है जिससे तुम उसका नाश करोगे। अगर वह राक्षस समझ गया कि तुम्हारे पास वह मणि है तो वह तुम्हे छोड़ेगा नही। तुम उस मणि को अपने मुंह में दबा लेना और नौटंकी करके मणि उसके शरीर से स्पर्श कर देना। चतुरानन्द बोला—मैं समझ गया, मुझे यह बताओ कि मणि कैसे मिलेगी। छड़ी बोली—इसकी चिंता मत करो, मैं तुम्हे मणि के पास पहुंचा दूंगी। फिर चतुरानन्द ने चलना प्रारम्भ किया कि तभी आँधी आई। आँधी इतनी तेज थी कि चतुरानन्द कहीं चला गया। चतुरानन्द ने देखा कि चारों तरफ प्रकाश ही प्रकाश था और आंधी न जाने कहाँ गई, पता ही नहीं चला। चतुरानन्द तुरंत समझ गया कि यह प्रकाश मणि से आ रहा है। उसने फुर्ती से मणि को मुंह में दबा लिया और चल दिया राक्षस को मारने। कुछ ही देर में वह राक्षस के पास पहुंच गया और गूंगे का नाटक करते हुए उसके पैरों में गिर गया और मुंह में दबी मणि को उसके पैरों से स्पर्श कर दिया। राक्षस तुरंत मर गया। उस राक्षस के मरते ही वह जंगल सोने का भवन हो गया। जब उसे छड़ी की याद आई तो उसने मणि से कहा—ए मणि! मुझे जादु की छड़ी के पास ले चलो। कुछ देर में वह एक खूबसूरत लड़की के पास पहुंच गया जो जादु की छड़ी थी। वह श्रापित थी। उसे एक लड़के से प्रेम होगा जो राक्षस को मारेगा और इसके उपरांत उसे उस लड़के से शादी करनी होगी। इस प्रकार चतुरानन्द ने उस खूबसूरत लड़की से विवाह कर लिया और सुखपूर्वक रहने लगा। बड़ों के अनुभव का सम्मान करना सीखो। एक बार की बात है कि एक ह्रष्ट-पुष्ट साँड़ था। वह एक गौशाला में रहता था। उसका शरीर इतना भारी-भरकम था कि उसे दरवाजे में से निकलते समय बहुत कठिनाई होती थी। साँड़ के पास इस कठिनाई का कोई हल नहीं था। उसका शरीर ही बहुत भारी था। उसे दरवाजे में से निकलते समय जोर लगाते हुए देखकर गौशाला की सब गायं हंस देती थी। एक दिन एक बछड़ा वहाँ आया। उस समय साँड़ गौशाला के अन्दर प्रवेश पाने के लिए दरवाजे पर जोर लगा रहा था। उसे ऐसा करते देखकर बछड़ा बोला, महोदय! ज़रा एक तरफ हटिए; मैं आपको बताता हूं कि अन्दर कैसे जाना है”। इस तरह वह साँड़ के साथ बहस करने लगा। साँड़ बछड़े की बात सुनकर मुस्कराया और बोला, “बेटा, यह काम मैंने उस समय सीख लिया था जब तू पैदा भी नहीं हुआ था”। बछड़ा निरुत्तर हो गया। उसे अपनी मूर्खता का आभास हो गया तथा वह सोचने लगा, “मुझे साँड़ को उपदेश देने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए थी क्योंकि मैं आयु में उससे बहुत छोटा हूं”। * * * * * ईमानदारी का फल एक ईमानदार व्यक्ति अपने लिए, अपने लोगों के लिए और अपने देश के लिए काम करता है। वह कभी नहीं चाहता कि कोई उसका काम करे या उसके किए गए काम पर दया दिखाए। काम में ही उसकी खुशी है और उसकी पसीने की एक-एक बूंद उसके लिए उपहार है जो उसके लिए और उसके लोगों के लिए खुशिया लाती है। राम नाथ एक रिक्शा चालक था। वह दिल्ली की भीड़-भाड़ वाली गलियों में रिक्शा चलाता था चाहे गर्मी है या सर्दी चाहे बारिश। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता था जब वह देर रात को अपनी मेहनत की कमाई को देखता था जो उसकी पत्नी और बच्चों के लिए थी। तब तक उसके बच्चे राधा और राजु सो चुके होते थे। वह अपने बच्चों को जरूर थपथपाता था चाहे वह अपने कम्बल में दुबके ही क्यों न हों। रामनाथ रिक्शा इसलिये चलाता था क्यों कि उसे कुछ और काम सुझाई नहीं दिया था। परंतु वह बहुत खुश था क्योंकि वह इतना तो कमा ही लेता था कि वह अपने परिवार को खुश रख सकता था और अपने बच्चों को स्कूल भेज पाता था। जब कभी वह अपने रिक्शा में सवारी ले कर भीड़ वाली सड़क पर निकलता था तो महंगी कारें, चम-चमाते स्कूटर, मोटर साईकल आदि उसके बाजु से निकल जाते थे, कई बार तो बड़े ही खतरनाक तरीके से। भीड़ को चीरता हुआ, घंटी बजाता हुआ ये सोचता था कि काश! मेरा रिक्शा भी मोटर कार होता। महंगी साड़ियों में लिपटी औरतें और सुन्दर, साफ-सुथरी स्कूल की वर्दी पहने बच्चों को देखकर अपनेख्यालों में पत्नी और अपने बच्चों को इस रूप में देखता है। लेकिन वह उनकी अमीरी को देखकर इर्श्या नहीं करता। वह मानता है कि ये उनकी मेहनत के कारण है और सोचता है कि अगर वह मेहनत करेगा तो वह भी अधिक कमा लेगा। रामनाथ के कईं पड़ोसी काफी अमीर थे मगर वह जानता था कि उन्होंने किस तरह ये पैसा कमाया है। उनमें से कुछ लोगों ने बईमानी की थी और लोगों को धोखा दिया था और कुछ ने तो चोरी भी की थी। इसलिए उन सभी लोगों को हमेशा ये भय बना रहता था कि कहीं किसी को पता न चल जाय या फिर पुलिस न पकड़ ले। परंतु रामनाथ को किसी प्रकार का भय नहीं था। एक गर्मी की दोपहर में एक सूटिड़-बूटिड़ व्यक्ति उसके रिक्शा में आ बैठा और नया बाज़ार चलने को कहा। वह एक व्यापारी लग रहा था और जल्दी में था। नया बाज़ार पहुंच कर उसका पता गलत निकला जिससे वह व्यापारी चिंतित हो उठा। रामनाथ ने इधर-उधर से पूछकर काफी ढ़ूंढ़ने के बाद उसे सही पते पर पहुंचा दिया। वह व्यापारी बहुत खुश हुआ परंतु रामनाथ की इतनी मेहनत के बावजूद भी उसने उसे थोड़े ही पैसे दिए। रामनाथ ने और अधिक देने को कहा परंतु उस व्यापारी ने देने से इन्कार कर आगे बढ़ गया। थोड़ा किराया पाने के बावजूद भी रामनाथ बहुत खुश था क्योंकि उसने एक अजनबी को उसके सही स्थान पर पहुंचाने में मदद की थी। गर्मी बहुत अधिक थी इसलिए वह घर की ओर चला गया। स्नान कर, भोजन कर जब वह वापिस काम पर जाने लगा तब उसकी बेटी ने आवाज़ लगाई, “पिता जी, देखो ये मुझे क्या मिला है”। रामनाथ बेटी के हाथ में एक सोने की अंगूठी देखकर हैरान हो गया। ध्यान से देखा कि उसमें एक बड़ा हीरा भी जड़ा था। उसने बेटी से पूछा, “ये तुम्हें कहां से मिला”। “यह रिक्शा के पायदान पर था’ बेटी ने जवाब दिया। रामनाथ ने सोचा कि यह जरूर उस व्यापारी की होगी जो बहुत जल्दी में था। पर उसके अनुसार वह तो वापिस जा चुका होगा। परंतु उसने सुना था कि वह गाजियाबाद से आया था और वह अनाज का व्यापार करता था। एक पल को उसके मन में आया कि वह उसे बेचकर हजारों रुपये पा सकता है परंतु तुरंत ही उसने इस विचार को झटक दिया और सोचा कि इसको उसे सही मालिक तक पहुंचाना है। अगली सुबह उसने गाजियाबाद की बस पकड़ी और अनाज के बाज़ार में उस व्यापारी को ढ़ूंढ़ लिया। उसे देखकर वह व्यापारी चिल्लाया, “तुम इतनी दूर और पैसे लेने आए हो। रामनाथ केवल मुस्कराया और बोला, “मैं तो सिर्फ ये जानने आया हूं कि कहीं तुम्हारी कोई चीज तो नहीं खो गई”। वह व्यापारी झटके से अपनी कुर्सी से उठा और रामनाथ का हाथ पकड़ कर बोला, “हाँ-हाँ मेरी लाखों की हीरे से जड़ी अंगूठी खो गई है। क्या तुम्हे मिली है? रामनाथ ने जैसे ही अंगूठी निकाली, उस व्यापारी ने झपट ली और हाथों में भींच ली। फिर वह अपनी तिजोरी से हजारों नोट निकाल लिए। वह रामनाथ को उसकी इमानदारी और उसको हुई कठिनाई के लिए इनाम देना चाहता था। परंतु रामनाथ ने लेने से इन्कार कर दिया ये कहकर कि वह तो केवल उसको उसके असली मालिक तक पहुंचाना चाहता था। ये कहकर वह वहां से चला गया। वह व्यापारी उसकी बात सुनकर हैरान रह गया और उसको जाते हुए तब तक देखता रहा जब तक वह भीड़ में ओझल नहीं हो गया। रामनाथ बड़ा खुश था। एक दिन वह सवारी की इंतजार में था। उसने अपने कन्धे पर किसी का हाथ महसूस किया। उसने मुढ़ कर देखा। पीछे उस व्यापारी को मुस्कराते हुए खड़ा पाया। उसने कहा, “तुम जैसे इमानदार व्यक्ति को रिक्शा चालक नहीं बल्कि बहुत कुछ और होना चाहिए। मैं तुमसे प्रार्थना करने आया हूं अगर तुम मेरे यहां काम करो। और मेरी दुकान में मुंशी हो जाओ। अगर तुम्हें मंजूर हो? आज रामनाथ उस दुकान में मुंशी है और अच्छी जिन्दगी गुजार रहा है और उसके बच्चे अच्छे स्कूल में जाते हैं। एक समय की बात है, एक धोबी के पास एक गधा था। जब वह धोबी अपने ससुराल जाता था तो गधे पर चढ़ कर जाता था। परंतु लौटते समय ससुराल के गाँव से बाहर आते ही उतर जाता और रस्सी से पकड कर गधे को ले आता। उसे पता था कि लौटने पर गधे को कपडो के गट्ठर उठाने पडेंगे। बेचारे को आराम मिलना चाहिए। एक बार वह धोबी अपनी ससुराल से आ रहा था। पीछे-पीछे उसका गधा। गधे के गले मे रस्सी बंधी थी। रस्सी का सिरा धोबी के हाथ मे था। गधा स्वयं चल रहा था, इसलिये रस्सी काफी ढ़ीली थी। धोबी किसी ख्याल मे डूबा हुआ था। सोचता हुआ बस सामने देखकर चल रहा था। दो ठगो ने इस प्रकार उन्हे जाते देखा तो धोबी से गधा ठगने की चाल चली। वे दबे पांव धोबी के पास पहुंचे। वहां उन्होने चतुराई से चलते हुए इस प्रकार गधे के गले से रस्सी खोली कि धोबी को कोई शक ही नही हुआ। एक ठग गधे को लेकर झाडियों में गायब हो गया। दूसरे ठग ने रस्सी का सिरा अपने गले मे बांध लिया और गधा बन कर चलने लगा। जब वे काफी दूर निकल गये तो गधा बना हुआ ठग खडा हो गया। धोबी तो चला ही जा रहा था, रस्सी तन गयी। धोबी ने बिना पीछे देखे रस्सी को खींचा और बडबडाया-------“अबे चलता क्यों नहीं?” ठग ने अपने गले को दबने से बचाने के लिये रस्सी हाथों से पकड ली थी। जब खीचने के बाद भी रस्सी ढ़ीली नही हुई तो धोबी ने पीछे मुड़ कर देखना चाहा कि गधा क्यों नही चल रहा है। गधे की जगह एक आदमी को रस्सी से बंधा देखकर धोबी चकित हुआ। वह हकला कर बोला—“अंय ! म..मेरा गधा कहां चला गया? तुम कोन हो भई?” ठग बोला—“मालिक, ! “मै ही वह गधा हूं। मैने इंसान के रूप मे ही जन्म लिया था। बचपन में मैं बहुत शरारती था। बहुत शैतानियां की। एक दिन दुखी हो कर मेरी माता ने मुझे सात वर्ष गधा बन कर प्रायश्चित करने का श्राप दिया। तब से गधा बनकर आपकी सेवा कर रहा था। कुछ क्षण पूर्व श्राप के सात साल पूरे हुए तो मैं फिर आदमी बन गया”। धोबी बोला—“लेकिन मैने तो तुम्हे तीन वर्ष पूर्व मेले मे खरीदा था”। ठग ने बात बनाई—“हां, उससे पहले मैं एक दो दूसरे धोबियों के पास रहा”। धोबी ने उसकी बात का विश्वास कर लिया। रस्सी खोल कर उसने अपनी जेब से जितने पैसे थे, निकाल कर ठग को दे दिये और सलाह दी—“यह पैसे लो। अपनी मां के पास लौट जाओ। अब शरारत न करना। खूब मेहनत करना और अपनी मां की सेवा कर उसे खुश रखना”। ठग पैसे लेकर चलता बना। दोनो ठग मिले तो धोबी की मूर्खता पर खूब हंसे। ठगो ने वह गधा अच्छे दामो मे गधों के व्यापारी को बेच दिया। कुछ दिनो बाद पशु मेला लगा। मेले मे वह गधा भी बिकने के लिये आया। उधर धोबी भी नया गधा खरीदने मेले मे आया और गधो को देखता हुआ वह उस अपने वाले गधे के पास आया। गधा उसे जाना-पहचाना सा लगा। धोबी ने उसकी पीठ पर अपना लगाया हुआ निशान देखा। गधा भी अपने मालिक को पहचान कर खुशी से कान फडफडाने लगा। धोबी बोला—‘तुझे मां ने फिर गधा बना दिया? घर जाते ही फिर कोई शैतानी कर बैठा। मैं तेरे जैसे नालायक को नही खरीदूंगा”। धोबी को गधे से बात करते देख लोग हंसने लगे। लोगो ने समझा यह पागल हो गया है। यह बात धोबी के गांव भी पहुंच गई। गांव वालो ने कहा या तो इसका दिमाग खराब हो गया है या भंग-वंग का नशा करने लगा है। कहीं किसी दिन कपडों को जला-वला न दे या फाड न डाले। यह सोच कर लोगो ने उसे धुलने के लिये कपडे देना बन्द कर दिया। धोबी न घर का रहा न घाट का। शिक्षा—इस कहानी से हमे शिक्षा मिलती है कि दूसरों की बातों का बिना सोचे-समझे विश्वास नहीं करना चाहिए। लालच प्राचीन काल में मिडाज़ नाम का राजा था। वह उस समय का सबसे धनवान व्यक्ति था। जितना धन उसके पास था उससे अधिक पाने की लालसा करता था। वह अपने सोने-चांदी तथा हीरो के जवाहरात एक बडे हालनुमा कमरे में रखता था नया प्रतिदिन उनकी गिनती करता था। वह बहुत अधिक धन प्राप्ति को ही खुशी मानता था। मिडाज़ इतना लालची हो चुका था कि वह हमेशा अपनी प्रजा पर और अधिक कर लगाने की सोचता रहता था। वह अपने ऊपर अपनी सुख-सुविधा के लिए कुछ भी खर्च करना नही चाहता था। एक दिन जब वह अपने जवाहरात गिन रहा था, वहाँ एक परी प्रगट हुयी। परी ने पुछा – “मिडाज़ क्या कर रहे हो और तुम्हे क्या परेशान कर रहा है”। मिडाज़ बोला, “अभी मेरे पास धन-दोलत की कमी है, मुझे और सोना चाहिये, मेरा महल इसकी दिवारे, खम्बे और छत भी सोने की होनी चाहिये”। परी ने पूछा, “यदि ये सब तुम्हे मिल जायेगा तो क्या तुम खुश हो जाओगे”। “हाँ-हाँ, क्यों नही, ये सब मिलने से मैं खुश हो जाऊंगा। क्या तुम ऐसा कर सकती हो, यदि हाँ, तो कृपया मेरी ये इच्छा जरुर पूरी करो”। “हाँ मैं ऐसा कर सकती हूँ। आज से तुम जिस चीज़ को भी हाथ लगाओगे, वह सोने की हो जायेगी” कहकर परी गायब हो गयी। राजा मिडाज़ की खुशी का ठिकाना न रहा। उसके जीवन भर की इच्छा पूरी हो गयी थी। उसने अपने महल की दिवारो को छुआ, वह सोने की हो गयी, फर्श को छुआ, सोने का फर्श हो गया, खम्बों को छुआ, वह भी सोने के हो गये, छत को, महल में रखे सामान को, जिस चीज को भी हाथ लगाया, वह सोने का हो गया। राजा बहुत खुश था। कुछ समय पश्चात उसे भूख लगी। उसने सेवक को खाना लाने का आदेश दिया। नौकर ने भोजन परोस दिया। उसने जैसे ही छुरी, कांटे व चम्म्च को छुआ, वह सोने की हो गयी। वह खुशी से पागल हो गया। तब उसने खाने के लिये सेब उठाया, वह भी सोने का हो गया, उसने संतरा, अंगुर जिसे भी छुआ वह सोने का हो गया। अब वह सोना कैसे खा सकता था उसे बहुत अधिक भूख लगी थी। उसने गिलास में दूध लेकर पीने के लिए होठों से छुआ वह दूध भी सोने का हो गया। उसने मेज पर पडी अन्य सामग्री जैसे मक्खन, चीज़, मीट, ब्रेड को लेने की कोशिश की, वह सभी वस्तुएँ सोने में परिवर्तित हो गयीं। अब राजा मिडाज़ बहुत उदास हो गया। परंतु राजा मिडाज़ के साथ सबसे बुरा हाल तब हुआ, जब उसने अपनी पुत्रि को बुलाया और उसे बाहों मे ले लिया। वह प्यारी बच्ची सोने की मूर्ती हो गयी। मिडाज़ हैरान रह गया और जोर-जोर से रोने लगा। वह काफी समय तक रोता रहा। उसने भगवान से प्राथना की, “मेरी सोने की चाहत के वरदान को वापिस ले लो, मेरी पुत्री मुझे वापिस लोटा दो। परी फिर से प्रकट हुयी। राजा अभी तक रो रहा था। परी ने जब राजा का पश्चाताप देखा, तो परी को उस पर दया आयी। परी ने राजा से वरदान वापिस ले लिया और उसकी पुत्री को जीवन दान दे दिया और सभी वस्तुओ को वैसा कर दिया, जैसे था। अब राजा मिडाज़ बिल्कुल बदल चुका था। उसका सोने चांदी का लालच समाप्त हो गया था। अपनी पुत्री को वापिस पा कर बेहद खुश था। उसने अपना सारा जीवन प्रजा की सेवा में कुर्बान कर दिया। इससे हमे शिक्षा मिलती है कि हमें लालच नही करना चाहिए| बुद्धिमान लोग कम ही धोखा खाते हैं। एक खगालय में बहुत बड़ी संख्या में पक्षी रहते थे। वहां उन्हें खूब सुरक्षित ढंग से रखा गया था। दुर्भाग्यवंश वहां एक महामारी फैल गई जिसके फलस्वरूप खगालय के बहुत से पक्षी बीमार पड़ गए। खग-रक्षक चिंतित हो उठा तथा किसी डॉक्टर की खोज में निकल पड़ा। जब वह किसी डॉक्टर के विषय में लोगों से पूछ रहा था तो एक बिल्ली ने उसकी बातें सुन लीं। इस प्रकार उसे पता चल गया कि खगालय के पक्षी बीमार हैं। दुष्ट बिल्ली किसी-न-किसी तरह खगालय में पहुँचने की योजनाएं बनाने लगी। खूब सोच-विचार के पश्चात उसने डॉक्टर बनकर खगालय में प्रविष्ट होने का निश्चय किया। अत: उसने एक डॉक्टर का वेष बनाया और हाथ में दवाइयों का बक्स लेकर खगालय के द्वार पर पहुँच गई। कैसे हैं आप सब लोग? मैं आपका इलाज करने आई हूं। “यह देखो मेरा दवाइयों वाला बक्स,” दुष्ट बिल्ली ने पक्षियों से कहा। “हम बिलकुल ठीक-ठाक हैं, मौसी। हमें दवाइयों की ज़रूरत नहीं है। कृपया आप यहां से शीघ्रातिशीघ्र चली जाएं,” पक्षियों ने उत्तर दिया। इस प्रकार बुद्ध से पक्षियों ने स्वयं को धोखे से बचा लिया। भाग्य का खेल एक गांव में पारो नामक एक गरीब विधवा रहती थी। उसका एक पुत्र था। वह इतनी गरीब थी कि घर में चार बर्तन भी ढ़ंग के नहीं थी। लड़का अभी छोटा था। पारो ने बड़े प्यार से उसका नाम नसीब सिंह रखा था। मगर वह इतना बदनसीब था कि उसके पैदा होने के कुछ समय बाद ही एक बिमारी से उसके पिता की मृत्यु हो गई। पारो घरों में चौका-बर्तन आदि करके उसे पाल रही थी। उसे पक्का विश्वास था कि नसीब सिंह बड़ा हो कर उसके सारे संकट दूर कर देगा और उसका बुढ़ापा चैन से गुजरेगा। इसी आस में रात-दिन मेहनत करके वह अपने बेटे को पाल रही थी। नसीब सिंह था तो छोटा, किंतु समझदार बहुत था। संयम और धीरज की उसमें कमी न थी। किसी भी बात को गहराई तक जानने की उसमें प्रबल उत्सुकता रहती थी। एक दिन उसने अपनी माँ से पूछा—“माँ ! हम इतने गरीब क्यों हैं”? ”यह सब तो ईश्वर की मर्जी है बेटे”। दुखी स्वर में पारो ने कहा—सब नसीब की बात है। मगर नसीब सिंह यह उत्तर पाकर संतुष्ट नहीं हुआ। वह बोला—“ईश्वर की ऐसी मर्जी क्यों है”। “बेटा यह तो ईश्वर ही जानें”। अगर ईश्वर ही जानें तो ठीक है, मैं ईश्वर से ही पूछुंगा कि हम इतने गरीब क्यों हैं? बताओ माँ, बताओ कि ईश्वर कहां मिलेगा। पारो तो वैसे ही परेशान रहती थी। अत: उसकी बातों से उकता कर उसने कह दिया—“वह जंगलों में रहता है, लेकिन तुम वहां न जाना”। लेकिन नसीबसिंह ने दिल ही दिल में उसी क्षण इरादा बना लिया कि वह ईश्वर को ढ़ूंढ़ेगा और पूछेगा कि आखिर हम इतने गरीब क्यों हैं? एक दिन वह जंगल की ओर चल दिया। जंगल घना और भयानक था। चलते-चलते नसीब सिंह बुरी तरह थक गया, मगर भगवान की परछाई भी उसे दिखाई नहीं दी। अत; वह थक-हार कर पत्थर की एक शिला पर जा बैठा और सोचने लगा कि भगवान तो यहां कहीं नहीं हैं। आखिर गरीबी दूर कैसे हो? तभी संयोग वश मृत्यु लोक का भ्रमण करते-करते शिव पार्वती उधर ही आ निकले। उन्होंने बच्चे को वहाँ बैठे देखा तो उन्हें बड़ा अचरज हुआ कि यह अबोध बालक इस बीहड़ जंगल में बैठा क्या कर रहा है? भगवान शिव ने बालक से पूछा—“तुम कौन हो बालक और इस जंगल में बैठे क्या कर रहे हो”? ”मैं ईश्वर को ढ़ूंड़ रहा हूं”। ईश्वर को। पार्वती चौंकी और पूछा—“मगर क्यों? ईश्वर से तुम्हे क्या काम है”। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि हम इतने गरीब क्यों हैं, दूसरों की तरह हम पर भी भाग्य की कृपा क्यों नहीं है? निर्भीक सिंह ने निर्भीकता से उत्तर दिया। माँ पार्वती और भगवान शिव उस बच्चे का साहस देखकर बहुत प्रसन्न हुए। माँ पार्वती तो करुणा का सागर है। उन्हें उस बच्चे पर बड़ी दया आयी और भगवान शिव से मुखातिब हो कर बोली—प्रभु। इस बालक का कुछ कीजिए। ”हम कुछ नहीं कर सकते पार्वती, क्योंकि इसके भाग्य में यही सब लिखा है। भाग्यदेवता के लेख के अनुसार इसे ऐसा ही जीवन भोगना है। “नहीं-नहीं स्वामी आपको कुछ करना ही होगा”। माँ पार्वती हठ करने लगी। ”जिद न करो पार्वती। यदि हम उसे कुछ दे भी देंगे तो वह इसके पास नहीं रुकेगा। इसे वैसा ही जीवन जीने दो जैसा भाग्यदेव चाहते हैं”। ”नहीं प्रभु इसकी गरीबी दूर करने के लिए आपको इस पर कृपा करनी होगी”। जब माँ पार्वती जिद करने लगी तो भगवान भोले शंकर ने बच्चे को एक हार दे दिया। हार पाकर नसीब सिंह बहुत प्रसन्न हुआ और खुशी-खुशी अपने घर को चल दिया। माँ पार्वती संतुष्ट थी कि उन्होंने एक अबोध बालक की मदद की और अब उसके दिन सुख से कटेंग़े, लेकिन त्रिकालदर्शी भोले बाबा जानते थे कि यह हार उसके पास रहेगा ही नही। चलते-चलते नसीब सिंह के पेट में अचानक दर्द उठा और वह शौच के लिए इधर-उधर देखने लगा। उसने भगवान शिव का दिया हार पत्थर की एक शिला पर रख दिया और झाड़ियों के पीछे चला गया। तभी एक चील कहीं से उड़ती हुई आई और उस हार को उठा कर उड़ गई। “अरे...मेरा हार...”। सब कुछ भूल कर लड़का चील के पीछे भागा। मगर कब तक वह चील का पीछा करता। कैसे पकड़ता उसे। एकाध बार पत्थर उठा कर उसने चील को मारने की कोशिश की किंतु चील अधिक उंचाई पर थी। कुछ ही पलों में चील उसकी नज़रों से ओझल हो गई तो वह बड़ा दुखी हुआ और रोते-रोते अपने घर की ओर चल दिया। घर पहुंच कर उसने माँ को सारी बात बताई, मगर पारो को उसकी बात पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं हुआ। हाँ, उसकी बात सुनकर थोड़ी सी उदास अवश्य हो गई। लेकिन नसीब सिंह माँ की उदासीनता देखकर हतोत्साहित नहीं हुआ। उसने मन-ही-मन निर्णय लिया कि वह कल फिर वहीं जायेगा और भगवान शिव पार्वती को अपनी विपदा सुनायेगा। उसका विश्वास था कि भगवान शिव उस धूर्त चील को अवश्य ही दंड़ देंगे। भगवान शिव ने पार्वती से कहा—“देखो उसके पास कल वाला हार नहीं रहा, उसे एक चील ले उड़ी है और दूसरा हार पाने व उस चील को दण्ड़ दिलवाने की इच्छा लिए वह लड़का आज फिर आया है”। पार्वती देवी ने फिर भगवान शिव से प्रार्थना की, आप चाहे चील को दण्ड़ दें या न दें, किंतु इस लड़के की सहायता करके इसकी निर्धनता दूर करें। ”हम अब कुछ नहीं कर सकते देवी। यदि तुम जिद करती हो तो हम ब्रह्मा से कहते हैं, वही इस बालक की कुछ सहायता करेंगे”। कहकर भगवान शिव ने ब्रह्मा जी को बुलाया और सारी बात बता कर आग्रह किया कि आप ही इसकी कुछ मदद करें। तब ब्रह्मा जी ने लड़के को हीरे की एक अंगूठी दे दी। लड़के ने अंगूठी जेब में रखी और खुशी-खुशी अपने घर चल दिया। उसने सोच लिया था कि वह अब एक पल के लिए भी अंगूठी को अपने से अलग नहीं करेगा। चलते-चलते अचानक उसे प्यास लगी। वह सरोवर के किनारे पहुंचा और जैसे ही वह चुल्लु भर कर पानी पीने के लिए झुका, वैसे ही उसकी जेब से अंगूठी निकल कर पानी में जा गिरी और इससे पहले कि वह उठाता, एक मछली उसे निगल गई। भाग्य बहादुर फिर रोते-रोते घर आया और माँ को सारी बात बताई। ”बेटा! जब तक भाग्य में नहीं है, तब तक कोई भी चीज नहीं रुकेगी” माँ ने उसे दिलासा देते हुए कहा—“जब भाग्य देवता खुश होंगे तो मिट्टी भी सोना बन जायेगी मगर इस प्रकार किसी के देने से हमारी गरीबी दूर नहीं होगी”। उसे समझा कर माँ अपने काम में लग गई। मगर भाग्य बहादुर भी हार मानने वाला नहीं था। उसने मन-ही-मन सोच लिया था कि वह कल फिर जायेगा। तीसरे दिन वह फिर जा पहुँचा। शिव और पार्वती उसका यह साहस देखकर बहुत खुश हुए। शिव जी ने इस बार ब्रह्मा जी के पास जा कर बात की कि वह लड़का तो बड़ा साहसी है। इसका कुछ उद्धार किया जाना चाहिए। तब ब्रह्मा जी ने सलाह दी कि हमें भगवान श्री हरी के पास जाना चाहिए। वही इसका कोई हल बतायेंगे। अत: वह श्री हरी के पास जा पहुंचे। पूरी बात सुनकर भगवान विष्णु ने भाग्य बहादुर को कुछ हीरे दिये। हीरे पा कर वह बहुत खुश हुआ और इस बार बिना कहीं रुके उसने सीधे अपने घर जाने का निश्चय किया, क्योंकि दो बार उसकी चीजे खो चुकी थी। जब वह घर पहुंचा, माँ घर पर नहीं थी। अत: भाग्य बहादुर ने हीरे एक लोटे में रखकर कोने में छिपा दिये और माँ को ढ़ूंढ़ने निकल पड़ा। वह मन-ही-मन सोचने लगा कि अब माँ को किसी के घर काम करने की क्या आवश्यकता है। अब तो वह भी अमीर बन गये हैं। उधर पीछे से चोर उसके घर में घुसे और जो भी सामान हाथ लगा, लेकर भाग निकले। उस सामान में लोटा भी था, जिसमें हीरे रखे थे। जब वह माँ के साथ वापिस आया तो देखा कि हीरे गायब थे। इतना ही नहीं, घर का दूसरा सामान भी गायब था। अब तो उसकी माँ को बहुत गुस्सा आया, वह बोली—क्यों मुझे नईं-नईं कहानियाँ सुना कर पागल बनाता जा रहा है। सारा दिन आवारा की तरह इधर-उधर भटकता रहता है और शाम को पिटाई के ड़र से कोई नयी कहानी सुना देता है। माँ की ड़ांट सुन कर लड़का रोने लगा। वह तो केवल वही जानता था कि जो कुछ भी उसने बताया था, वह सत्य था। ड़ांट खाकर लड़के की हिम्मत और बढ़ गई और अगले दिन वह फिर उसी स्थान पर जा पहुंचा। भगवान भोले शंकर सोचने लगे कि इस पर इतनी मुसीबते पड़ी लेकिन इसने हिम्मत नहीं हारी। इससे वह बहुत प्रसन्न हुए और भाग्य देवी के पास जा कर बोले—“यह लड़का बहुत ही साहसी, हिम्मती और धीरज वाला है, ऐसा व्यक्ति अभागा नहीं हो सकता। इसे कुछ दे दो”। आज्ञा पाकर भाग्य की देवी ने भाग्य बहादुर को सोने का एक सिक्का दिया। सिक्का ले कर भाग्य बहादुर खुशी-खुशी अपने घर को चल दिया। जब उसने घर जा कर वह सिक्का अपनी माँ को दिया तो उसकी माँ बहुत खुश हुई। अब क्योंकि उन पर भाग्य देवी की कृपा हो गयी थी, अत: सारे काम ही अपने-आप शुभ होने लगे। दूसरे दिन ही एक मछली वाला उसके गांव में मछली बेचने आया तो लड़के ने वही सिक्का देकर मछली खरीद ली। उसकी माँ ने मछली का पेट चीरा तो वह अंगूठी निकली, जो ब्रह्मदेव ने उसे दी थी और जो उसकी जेब से तालाब में गिर गई थी। माँ ने अंगूठी सम्भाल कर रख ली और भाग्य बहादुर से बोली—“जा बेटा, जंगल से थोड़ी लकड़ियां ले आ, आज घर में ईंधन बिल्कुल नहीं है”। लड़का कुल्हाड़ी ले कर जंगल की ओर चल दिया। वहाँ जा कर जिस पेड़ पर लकड़ी काटने के लिए चढ़ा, वहाँ उसी चील का घोसला था, जो उसका हार उठा कर ले गई थी। लड़के ने देखा कि चील कहीं आस-पास नहीं थी। भाग्य बहादुर ने अपना हार उठा लिया और जो भी थोड़ी बहुत लकड़ियाँ पेड़ के आस-पास पड़ी थी, वही उठा कर घर की ओर चल दिया। माँ हार पाकर बहुत खुश हुई। अब तो देखते ही देखते उनके दिन बदल गये। घर में किसी चीज का अभाव नहीं रहा। फिर ईश्वर की कुछ ऐसी करनी हुई कि जो चोर उसके घर से हीरे चुरा कर ले गये थे, उन्हें सपने में महादेव ने चेतावनी दी कि जो हीरे उस लड़के के घर से चुरा कर लाये थे, वे तुरंत वापिस कर दो, वरना तुम्हारा सर्वनाश कर दूंगा। चोर उसी दिन हीरे उसके घर पर दे गए और अपनी गलती के लिए माफी भी मांगी। इस प्रकार उस अभागे का भाग्य चमक उठा, अब उसके घर में किसी चीज की कमी न थी और उनकी गरीबी सदा के लिए समाप्त हो गई।