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a b c d e f g h i j k l m n o p q r s t u v w x y z a b c d e f g h i j k l m n o p q r s t u v w x y z hindi magazine guldusta online lekh new zealand recipies nuske tips abcdefghijklmnopqrstuvwxyz qwertyuiop content हिंदी भ्रामरी प्राणायाम : मस्तिष्‍क का मित्र क्‍या कारण है की भ्रामरी प्राणायाम सभी प्रकार के मानसिक रोगों में आशातीत लाभ पहुचाता है? पहले विधि पर विचार करते हैं । विधि: पदमासन, सुखासन या ब्रजासन में बैठ जायें रीढ सीधी हो आखें बंद रखें अब दोनों हाथों के दोनों अगूंठों से दोनों कान बंद कर लें। पहली अगुंली माथे पर, दूसरी अंगुली आँखों पर तीसरी अंगुली साइनस पर अर्थात नाक पर चौथी अंगुली होंठों पर व कोहनी उपर की तरफ सीधी हो। अब दोनों नासा छिद्रों से धीमा लम्‍बा गहरा पूरा श्‍वास भरें 10 सैंकड आन्‍तरिक कुम्भक लगाकर भॅबरे की तरह आवाज करते हुये धीमे – धीमे श्‍वास का रेचन करें । पूरक कुम्‍भक रेचक कितनी बार लाभ 4 से 5 सैकेंड़ 6 से 8 सैकेंड़ 8 से 10 सैकेंड़ 10 बार चिडचिडाहट, याददास्‍त कमजोर जिददी 8 से 10 सैकेंड़ 10 से 12 सैकेंड़ 20 से 25 सैकेंड़ 11 बार मिर्गी, उखडामन बैचेनी, मानसिक कमजोरी 10 से 12 सैकेंड़ 12 सैकण्‍ड 30 से 40 सैकेंड़ 20 बार अनिद्रा,डिप्रैशन, साइज़ोफ्रोनिया तनाव 5 से 6 सैकेंड़ 15 से 20 सैकेंड़ 40 सैकेंड़ 40 बार सेक्‍सुअलविझिप्‍तता, रिपिटेशन, हिस्‍टीरिया जब भ्रामरी प्राणायाम किया जाता है तो न्‍यूरान्‍स में उपस्थित रेशा डेन्‍ड्रस उत्‍तेजित होने लगते हैं और एक्‍सान का कार्य तेज गाति से सम्‍पूर्ण शरीर में न्‍यूरोन्‍स के माध्‍यम से सवेदनायें भेजना है चूकि इस समय मस्‍तष्कि भ्रामरी अर्थात गुंजन की स्थिति में होता है और मस्तिष्‍क में ठीक होने का विचार होता है सो एक्‍सान नेटवर्किग सिस्‍टम के माध्‍यम से सम्‍पूर्ण शरीर में ठीक होने की सूचनायें प्रेषित करता है ठीक इसी समय केन्द्रिय तंत्रिका तंत्र सक्रिय हो हार्मोनो के स्‍त्राव में बढोतरी करता है जिसमें सेरोटोटोनिन, टी.एस.एच, एन. डी.एच., एस्‍ट्रोजन, एन्‍ड्रोजन, एंड्रोमार्फिन आदि का स्‍त्राव बढ जाता है फलस्‍वरूप मन खुश व जोशीला हो जाता है । और यही कारण है कि भ्रामरी प्राणायाम करने के तुरन्‍त बाद अच्‍छा लगता है । यदि नियमित रूप से भ्रामरी का अभ्‍यास किया जाय तो मानसिक रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है| कैंसर के लिए खास पेय पदार्थ This MIRACLE DRINK has been circulating for a long time long long ago. It is worth your while to take note. There is a celebrity Mr. Seto who swears by it. He wants to make it public to draw the attention of people who have cancers. This is a drink that can protect bad cells forming in your body or it will restrain its growth! Mr. Seto had lung cancer. He was recommended to take this drink by a famous Herbalist from China . He has taken this drink diligently for 3 months and now his health is restored, and he is ready to take a pleasure trip. Thanks to this drink! It does not hurt for you to try. It is like a Miracle Drink! It is simple. You need one potato, one carrot and one apple that combine together to make the JUICE ! Wash the above, cut with the skin on into pieces and put them into the juicer and immediately you drink the juice. You can add some lime or lemon for more refreshing taste. This Miracle Drink will be effective for the following ailments: 1. Prevent cancer cells to develop. It will restrain cancer cells to grow. 2. Prevent liver, kidney, pancreas decease and it can cure ulcer as well. 3. Strengthen the lung, prevent heart attack and high blood pressure. 4. Strengthen the immune system 5. Good for the eyesight, eliminate red and tired eyes or dry eyes 6. Help to eliminate pain from physical training, muscle ache 7. Detoxify, assist bowel movement, eliminate constipation. Therefore it will make skin healthy & LOOK more radiant. It is God sent for acne problem. 8. Improve bad breath due to indigestion, throat infection, 9. Lessen menstrual pain 10. Assist Hay Fever Sufferer from Hay Fever attack. There is absolutely no side effect. Highly nutritious and easily absorbs! Very effective if you need to loose weight. You will notice your immune system will be improved after 2 week routine. Please make sure to drink immediately from the juicer for best effect. WHEN TO DRINK IT; DRINK IT FIRST THING IN THE MORNING WITH THE EMPTY STOMACH! AFTER ONE HOUR YOU CAN EAT BREAKFAST. FOR FAST RESULTS DRINK 2 TIMES A DAY, IN THE MORNING AND BEFORE 5 P.M. बढ़ती समस्या-अस्थमा बढ़ते प्रदूषण के कारण अस्थमा के मरीजों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। अस्थमा एक ऐसी बीमारी है जो श्वास नलिकाओं को प्रभावित करती है। अस्थमा के दौरान खांसी, नाक बंद होना या बहना, छाती का कड़ा होना, सुबह-सवेरे और रात को सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्याएं होती है। दमा का कोई स्थायी इलाज नहीं है लेकिन इस पर नियंत्रण जरूर किया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि रोगी को घूल मिट्टी, घुएं आदि से खासतौर पर दूर रहना चाहिए। अस्थमा के दोरे के दौरान सांस की नलिकाएं बन्द हो जाती है और शरीर के अंगों तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती। अस्थमा को नियंत्रण में रखने के लिए कईं ऐसे कारागर उपाय है जिन्हे अपना कर फायदा उठाया जा सकता है। अस्थमा आमतौर पर एलर्जी के कारण होता है। ऐसे में एलर्जी को नियंत्रि‍त करने के लिए ये कुछ उपाय कर सकते हैं। ¯ एक चुटकी हल्दी को पेन में सेक कर दूध में डालकर सुबह-शाम पीनी चाहिए। ¯ अस्थमा का दौरा बार-बार न पड़े इसके लिए हल्दी और शहद मिलाकर चांटनी चाहिए। ¯ एलर्जी के मरीज को विटामिन सी का सेवन करना चाहिए जैसे-: नींबू पानी पीना, आवंला खाना जो कि काफी फायदेमंद होता है। ¯ शहद की गंध को अस्थमा के रोगी को सुधांने से भी काफी आराम मिलता है। ¯ तुलसी अस्थमा को नियंत्रि‍त करने में बहुत ही लाभकरी है। तुलसी को पानी के साथ पीसकर उसमें शहद डालकर चाटने से दमे से राहत मिलती है। ¯ अस्थमा के रोगी को सर्दी से बच कर रहना चाहिए इसके लिए कुछ ये उपाय कर सकते हैं। ¯ छाती पर सरसों के तेल की मालिश करते रहना चाहिए। ¯ मैथी के दानों का काढ़ा बना कर पीना चाहिए ¯ लौंग का काढ़ा बना कर शहद मिला कर पीना चाहिए। ¯ अस्थमा के रोगी को लहसून की चाय या फिर दूध में लहसून उबालकर पीना भी लाभदायक है। गर्भावस्था और स्वास्थ हमेशा से यही कहा जाता है कि गर्भवती होना अर्थात स्त्री का दूसरा जन्म होना। इस दौरान स्त्री के लिए जोखिम जुड़े होते हैं। लेकिन कुछ प्रैगनेंसी काफी हाई रिस्क होती हैं खासकर जब इस दौरान कोई स्वस्थय सम्बन्धी समस्या हों। इसलिए प्रैगनेंसी के दौरान महिलाओं को अपना ध्यान रखना चाहिए। अपना ध्यान कैसे रखना चाहिए, इस बारे में कुछ जरुरी बातों की जानकारी होना अति आवश्यक है। माईग्रैन: गर्भवती होने के दौरान काफी महिलाओं को माईग्रेन हो जाता है। कुछ महिलाओं को सिर-दर्द में कमी आ जाती है। यदि आप माईग्रेन की कोई दवा लेते हैं तो अपने ड़ॉक्टर को पहले ही बता देना चाहिए। ताकि वह आपको बता सके कि वह दवा आपके गर्भ के लिए सुरक्षित हैं या नहीं। यदि इस दौरान कोई सर-दर्द की कोई दवा ले रहे है तो अपने ड़ॉक्टर से पूछ कर ही लें। अस्थमा: यदि गर्भवती महिला को अस्थमा की समस्या है तो घबराने की जरूरत नहीं है। यदि आप अपने ड़ॉक्टर को इसकी जानकारी पहले ही दे देते हैं तो वह आपको बता सकते हैं कि कोन्सी दवाएं लेना सुरक्षित हैं। आप स्वयं भी अपना ख्याल रख सकती हैं समय पर अपनी दवा ले कर। डॉयबीटीज़: पहले से ड़ॉयबीटीज़ होने पर आप शुरु से ही अपनी शुगर को नियंत्रण में रख सकती हैं। ऐसे में गर्भधारण से 2-4 महीने पहले ही अपनी शुगर पर नियंत्रण रख लेना चाहिए। यदि ड़ॉयबीटीज़ को नियंत्रण में रखा जाय तो प्रैगनेंसी के दौरान कोई समस्या नहीं आती। किड़नी की समस्या: प्रैगनेंसी के दौरान अक्सर युरिनरी ट्रैक्ट इंफैक्शन (UTI) होनी के खतरे बढ़ जाते हैं। यदि ये समस्या प्रैगनेंसी से पहले है तो पहले इसका इलाज करवायें। क्योंकि यदि इसका इलाज ना किया जाय तो किड़नी के लिए हानिकारक होता है। थायरॉयड़: हाईपोरॉयड़ य हाईपोथायरॉयड़ दोनों स्थितियों में ड़ॉक्टरी परामर्श की ज़रूरत है इसलिए प्रैगनेंसी से पहले ही इसकी जांच करवा लेनी चाहिए ताकि उसके अनुसार दवा का निर्धारण किया जा सके। कैंसर: यदि कभी कैंसर हुआ है तो प्रैगनेंसी से पहले अपने ड़ॉक्टर से सलाह जरूर करें ताकि बच्चे के लिए कोई खतरा ना हो और प्रैगनेंसी के दौरान कोई समस्या ना हो। हाईपरटेंशन: हाईपरटेंशन ऐसी समस्या है जिसका प्रभाव मां और बच्चे दोनों पर पड़ता है। इसकी वजह से मां को किड़नी की समस्या और सिर दर्द होने का खतरा रहता है और बच्चे की ग्रोथ की समस्या और खून की कमी हो जाने का खतरा रहता है। जिससे काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। एनिमिया: अनिमिया यानि खून की कमी, थकान और सांस का फूलना। इस दौरान शरीर में आयरन की कमी हो जाती है इसलिए अपनी ड़ॉक्टर की सलाह से आयरन सप्लीमैंट जरूर लेनी चाहिए। प्रैगनेंसी के दौरान यदि किसी भी तरह की तकलीफ हो जाय तो अपने ड़ॉक्टर को जरूर पूरी बात बताएं ताकि वह आपको उचित दवा बता सके जो आपकी प्रैगनेंसी के लिए सुरक्षित हो। इसके साथ-साथ आपका भी दायित्व बनता है कि आप अपना पूरा ख्याल रखें। तुतलाना और हकलाना F सुबह-सवेरे मक्खन में काली मिर्च का चूर्ण मिला कर खाने से हकलाहट दूर होती है। F फूला हुआ सुहागा शहद में मिला कर जीभ पर हल्का-हल्का रगडने से हकलाहट दूर होती है। F एक ताजा हरा आंवला प्रतिदिन चबाने से तुतलाना दूर हो जाता है। F हरा धनिया और अमलतास के गूदे को पानी में पीस कर उस पानी से एक महीने तक लगातार कुल्ले करने से हकलाहट दूर होती है। F सात बादाम की गिरी, सात काली मिर्च, कुछ बूंदे पानी की सहायता से चटनी बना लें और उसमे थोडी मिश्री मिला कर सुबह खाली पेट एक महीने तक चाटें। तुतलाना और हकलाना दूर हो जाता है। पैन्क्रिटाइटिस भाग में दाहिनी ओर ग्रहणी से लेकर प्‍लीहा तक फैली रहती है इस ग्रन्थि से दो पेन्क्रियास शरीर की एक महत्‍वपूर्ण ग्रन्थि है जहां पेट के उपरी महत्‍वपूर्ण स्‍त्राव निकलते है। 1. अग्‍नाशय रस— यह एक प्रबल पाचक रस होता है इसमें तीन प्रकार के स्‍त्राव होते हैं। रस सामान्‍य पित्‍त वाहिनी से मिलकर ग्रहणी में खुलते है और भोजन को पचाकर आगे की ओर धकेलते हैं। जब अग्‍नाशय ग्रन्थि द्वारा इस रस का स्‍त्रावण बहुत कम या बंद हो जाता है तो पेन्क्रिटाइटिस अर्थात अग्‍नाशय शोथ हो जाता है । 2. इन्‍सूलिन— अग्‍नाशय ग्रन्थि द्वारा स्‍त्रावित होने वाला दूसरा स्‍त्राव है जो सीधा रक्‍त में मिलकर ग्‍लूकोज की मात्रा को नियन्त्रित करता है। लक्षण 1. पेन्क्रिटाइटिस रोग में रोगी के पेट में दर्द बना रहता है दर्द तीव्र होता है उल्टियों की शिकायत लगातार व बार-बार बनी रहती है। जो कुछ भी खाया पीया है सब बाहर आ जाता है, पेट फूलना जारी रहता है। 2. इस रोग में रक्‍त में एमलाइलेज का स्‍तर बढ जाता है। कारण पेन्क्रिटाइटिस चूकि आंतों का रोग है अत: ऑतों से सम्‍बन्धित कोई भी परेशानी पेन्क्रिटाइटिस बन जाती है जैसे— ¯ लम्‍बे समय तक कब्‍ज रहना, या अमीबोबाइसिस का होना। ¯ हाइपर एसिडिटी भी पेन्क्रिटाइटिस का कारण हो सकती है। ¯ .मैदा युक्‍त खाना, बासीखाना, ठूस-ठूस कर खाना, अधिक गरिष्‍ठ भोजन करना जैसी समस्‍याओं से ग्रस्त होते हैं उन्‍हें यह रोग हो सकता है। ¯ .म्‍यूपस, पीलिया व टायफाइड रोगी को वायरस तेजी से पकडता है और इनकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है अत: इन रोगियों को पेन्क्रिटाइटिस होने का खतरा रहता है। ¯ .एंटीबॉयटिक की अधिकता भी पेन्क्रिटाइटिस का कारण बन जाती है क्योंकि शरीर उस मात्रा में एन्‍टीबॉड़ीज़ ड़्वैलप नही कर पाता है जिस मात्रा में एंटीबॉयटिक दी गई है और शरीर प्रतिक्रिया स्‍वरूप पाचक रसों का स्‍त्राव बंद कर देता है। उपचार— पैंक्रियाइटिक का सिर्फ एक ही उपचार है—‘उपवास’ ऐसे रोगी को 5 दिन के लिए पूर्ण उपवास पर रखना होगा इस उपवास के दौरान पानी देना भी बंद होता है शरीर को पानी की पूर्ति ड्रिप द्वारा की जाती है। पूर्ण उपवास के दौरान अग्‍नाशय पाचक रसों का स्‍त्राव धीरे-धीरे शुरू कर देता है उपवास निम्‍नानुसार रखें। शुरू के 5 दिन पूर्ण उपवास पानी भी नहीं 6 से 8वा दिन पानी उपवास 1-1 चम्मच हर 15 मिनट के अन्‍तराल से पानी पिलाये। 9 वें दिन रस उपवास पानी के साथ 2-2 चम्मच मौसमी का रस दें। 10 वें दिन उपवास 50मि.लि. पानी ग्‍लूकोस युक्‍त हर 1 घण्‍टे बाद 20ml रस हर 2 घण्‍टे बाद 12 वें दिन उपवास 70 ml पानी हर घण्‍टे बाद 100 ml रस हर 3 घण्‍टे बाद 13 वें दिन उपवास 70 ml पानी हर घण्‍टे बाद 100 ml रस हर 4 घण्‍टे बाद 14 वें दिन उपवास पानी प्‍यास अनुसार 15 ml रस दिन में पाच बार 100 ml दूध दिन में दोबार 15वें दिन 150 ml दूध * 20 gm दलिया * उबली सब्‍जी 20 gm * रस 16 वें दिन दूध * 50 gm दलिया सुबह शाम * उबली सब्‍जी सुबह शाम 17 वें दिन दूध दलिया, दहीं, सब्‍जी, * 1/2 रोटी 18 वें दिन दूध दलिया दही * सब्‍जी * रोटी भूख से कम जैसा मन, वैसा तन 1-अब नये सर्वेक्षणों से यह साबित हो गया है कि तनाव, ड़िप्रैशन व नकारात्मक मन खून को दूषित करने के साथ-साथ सम्पूर्ण शरीर की रासायनिक, हार्मोनिक व उपापचिय क्रियायों में भी गड़बड़ी पैदा कर देता है। 2-जन्म के बाद मनुष्य में रक्त का निर्माण अस्थिमज्जा (1/4 Bone Marrow) में होता है जो कि प्रत्येक हड्ड़ी की खोखली गुहा में पाया जाता है। यह मुलायम, चिकना व लाल-पीला रंग लिए होता है। इस द्रव्य में वसा, तंत्रिकाएं व रुधिर कोशिकाएं होती हैं। 3-कुल अस्थिमज्जा द्रव्य अपने शरीर के वज़न का 4 प्रतिशत होता है। अस्थिमज्जा द्रव्य दो प्रकार का होता है। रक्त की प्रत्येक कणिकाओं में तंत्रिका रज्जु मौजूद होता है जिन पर कि सूचनाए निहित होती हैं। खून के माध्यम से यह पूरे शरीर में गति करती रहती हैं। 1-Red 50% RBS,WBS, Platelets 2-Yellow 50% Plasma 3-Bone Marrow की तंत्रिकाएं सीधे तौर पर मस्तिष्क से जुड़ी होती हैं। जब मन तनाव में व नकारात्मक होता है तब अस्थिमज्जा की तंत्रिकाएं सिकुड़ जाती हैं। इन तंत्रिकाओं के सिकुड़ने से वसा कोशिकाओं पर दबाव पड़ता है फलस्वरूप WBS की संख्या बढ़ने लगती है और RBS की संख्या घटने लगती है। रक्त में RBS की संख्या घटते ही शरीर में खून की कमी आने लगती है और अस्थिमज्जा पहले की तुलना में रक्त का निर्माण कम कर देती है जिससे व्यक्ति एनीमिया का शिकार हो जाता है। यही स्थिति लम्बे समय तक रहे तो लीवर ऑफ सिरोसिस, ब्लड़ कैंसर, किड़नी फेलियर तथा अन्य रोगों से ग्रस्त हो जाता है। एनीमिया रोग में Bone Marrow कमजोर होने पर :- होने वाले परिक्षण सामन्य स्तर दुष्परिणाम ESR 5—5mm 1st hr बढने लगता है PLT 2 लाख से 4 लाख mm कम होने लगती है। WBC 4 लाख से 10 लाख mm बढ़ने लगती है। RBS 3.5 लाख से 6 लाख कम होने लगती है। HB 11 से 14 स्त्री Gm%DL कम होने लगता है। 12 से 14 पुरुष जब रोगी को प्राकृतिक उपचार दिया जाता है जैसे नेति, कुंजल, त्राटक, मिट्टी-पट्टी, कटि स्नान, रीढ़ स्नान, मालिश आदि तो शरीर की सफाई तेजी से होने लगती है फलस्वरूप अस्थिमज्जा की क्रियाशीलता में बढ़ोतरी होती है और वह रासायनिक परिवर्तन शुरु कर देती है जिसके कारण RBC की संख्या बढ़ने लगती है। जब व्यक्ति योगासन, ध्यान, प्राणायाम करने लगता है तो शरीर में ऑक्सीजन का अनुपात बढ़ने व खपत घटने लगती है फलस्वरूप मस्तिष्क को खून का प्रवाह तेज हो जाता है जिससे सेरोटीन व एण्ड़ोमार्फिन हार्मोनो का स्त्राव बढ़ जाता है जो व्यक्ति को जोशीला, प्रसन्न व उर्जावान बनाता है। स्वास्थय का राज—चबा-चबा कर खाना —जैसा खाएं अन्न, वैसा हो मन जब शरीर को सात्विक, पौष्टिक आयरन व कैल्शियम युक्त ताजा व कच्चा आहार दिया जाता है तो उपापचीय क्रियाएं तेज हो जाती हैं फलस्वरूप ये उपापचीय क्रियाएं सीधे तौर पर अस्थि मज्जा को प्रभावित करती हैं और अस्थिमज्जा द्वारा खून का निर्माण स्वच्छ व तेज तरीके से होता है। शरीर स्वयं चिकित्सक शरीर को बाहर से किसी प्रकार की औषधि की आवश्यकता नहीं है। शरीर की पूरी कार्य प्रणाली लगातार इसी कार्य में लगी रहती है कि शरीर हमेशा स्वस्थ रहे। इसके लिए मस्तिष्क ने सभी अंगों को अपने-आप काम सौंप रखे हैं और इन सभी कार्यों का नियंत्रण मस्तिष्क अपने पास रखता है। मस्तिष्क जरूरत के अनुसार हार्मोनों का स्त्रावण करता रहता है ताकि शरीर की क्रियाएं यथावत चलती रहें। रोग की स्थिति के अनुसार शरीर हजारों प्रकार की दवाईयों का निर्माण स्वयं कर लेता है। शरीर के अन्दर उपस्थित एंटीबॉड़ीज़ मस्तिष्क को सूचना भेजती रहती है कि शरीर में अमुक रोग हो गया है। मस्तिष्क तुरंत हार्मोनों का स्त्रावण शुरु कर देता है जो कि अमुक रोग को ठीक कर सके। कभी-कभी इस प्रक्रिया को यथावत चलाये रखने के लिए विश्राम, उपवास व धैर्य की जरूरत होती है जैसे :-- रोग समय जरूरी आहार प्राथमिक उपचार जुकाम/खांसी 3-4 दिन फलाहार/रसाहार जलनेति, कुंजल,छाती का सेक सिर दर्द 1-2 दिन रसाहार जलनेति, पट्टीनेति, एनीमा बुखार 2-3 दिन रसाहार जलनेति, पट्टीनेति, एनीमा पेट दर्द 1-3 दिन नींबू पानी कुंजल, पट्टी मिट्टी,एनीमा, गर्म-ठंड़ा, कटि स्नान खुजली 2-5 दिन फलाहार, दुग्धाहार कुंजल, पट्टी मिट्टी, एनीमा, सर्वांग मिट्टी, भाप स्नान हाथ पैरों में दर्द 2-7 दिन फलाहार/रसाहार मिट्टी पट्टी, एनीमा, धूप स्नान, भाप स्नान मालिश कमजोरी 4-10 दिन फलाहार, रसाहार मिट्टी पट्टी, एनीमा, धूप स्नान, भाप स्नान मालिश , ज्वारे का रस शरीर के अंग-प्रत्यंग औषध निर्माण करने वाली इकाईयां हैं जो हर पल शरीर के अनुसार प्राकृतिक औषधि का निर्माण कर शरीर को स्वस्थ रखते रहते हैं। शरीर का बफरिंग सिस्टम मल-मूत्र, पसीना, थूक आदि द्वारा शरीर के विजातिय तत्वों को बाहर कर फिल्ट्रेशन का काम करता रहता है। अंग दवाईयों के प्रकार स्त्रावित होने वाली औषधि यकृत 500 पैरासिटामोल, निमुसिलाईट,विटामिंस, इंटरफिरान, खनिज/लवण अमाश्य 34 इंसुलिन, इंटरफिरान मस्तिष्क 125 इंटरफिरान, टैटनस हड्ड़ियां 200 ऑयरन, विटामिन, ड़िफलोफैंस